सोमवार, 23 मार्च 2009

उड़ान

एक अकेली नाव,
बही जा रही है-
गहरे समुद्र में
चारों ओर,
पानी ही पानी |
कोई साथ नहीं,
किनारे का भी ,
कोई पता नहीं
दूर-दूर तक |


एक पत्ती आई है,
कहीं से उड़ते हुए,
और आकर बैठ गयी है,
उसी नाव में |
नाव खुश है,
उसके साथ कोई है |
और उससे भी अधिक,
खुशी है उसकी आत्मा में
कि वो मदद कर रहा है,
उस पत्ती की,
उसे किनारे तक पहुँचाने में,
उसे पानी में डूबने से बचाने में |

तेज आँधी चली है,
नाव ने संभाल लिया है,
अपने को,
पर पत्ती उड़ चली है,
दूर और दूर |
नाव ने अपनी गति बढ़ा ली है,
बिना खुद के उलटने की परवाह किए |
एक ही लक्ष्य है,
कि वो संभाल ले,
वो डूबने न दे,
उस पत्ती को,
गहरे रसातल में |

वो देख रहा है बहुत दूर से,
पत्ती उड़कर सुरक्षित पहुँच गयी है,
किनारे पर |
और उसने धीमी कर ली है,
अपनी गति फिर से |
चूर हो गये हैं,
उसके 'गुमान' और 'स्वाभिमान' दोनो ही |

अब जाने क्यों,
किनारा पास देखकर भी,
उसे जाने को मन नही करता |
जी में आता है की वो मंडराता रहे,
अकेला ही,
दूर-दूर तक फैले समुद्र में |

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