गुरुवार, 26 मार्च 2009

शहर

इस बार गाँव का सफ़र,
कुछ नया सा लगा |
सब कुछ बदला हुआ,
बिलकुल मेरे बचपन की तरह |

अब रसोई में गैस आ गयी है उपले कि जगह,
बल्ब आ गये हैं लालटेन कि जगह |
क्रिकेट बॉल आ गये हैं कंचों कि जगह,
लालसाएँ आ गयी हैं, सपनों के जगह |
व्यापार आ गया है, रिश्तों के जगह,
और राजनीति आ गयी है, प्रेम के जगह |

अब लगता है,
मैं बड़ा हो गया हूं
और संग-संग बड़ा हो गया है,
मेरा गाँव भी |

मुझसे ज्यादा,
मेरी हैसियत को जाना जाने लगा है,
और मेरा गाँव,
'शहर' क नाम से पहचाना जाने लगा है |

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